मन तोहे किहि बिध मैं समझाऊँ कबीर भजन

मन तोहे किहि बिध मैं समझाऊँ कबीर भजन

 
मन तोहे किहि बिध मैं समझाऊँ कबीर भजन

मन तोहे किहि बिध मैं समझाऊँ।
सोना होय तो सुहाग मंगाऊँ बंकनाल रस लाऊँ।
ग्यान सबद की फूँक चलाऊँ, पानी कर पिघलाऊँ।

घोड़ा होय तो लगाम लगाऊँ, ऊपर जीन कसाऊँ।
होय सवार तेरे पर बैठूँ, चाबुक देके चलाऊँ।

हाथी होय जंजीर गढ़ाऊँ, चारों पैर बंधाऊँ।
होय महावत तेरे पर बैठूँ, अंकुश लेके चलाऊँ।

लोहा होय तो एरण मंगाऊँ, ऊपर ध्वर ध्वाऊँ।
धुवन की घनघोर मचाऊँ, जंतर तार खिचाऊँ।

ग्यानी होकर ग्यान सिखाऊँ, सत्य की राह चलाऊँ।
कहत कबीर सुनो भई साधे अमरापुर पहुँचाऊँ। 

 

मन तोहे किहि बिध मैं समझाऊँ..... | Kabir Bhajan | Krishndas | Ram Katha Tirupati 2025 | Morari Bapu

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मन की चंचलता तो हर किसी को परेशान करती है। कभी सोने की तरह चमकता है, कभी घोड़े की तरह भागता है, तो कभी हाथी बनकर उछलता-कूदता रहता है। इसे पकड़ना आसान नहीं, क्योंकि ये न दिखता है न छूता है। बस एक ही रास्ता है—ज्ञान की ज्योति जलाकर इसे रोशन करना। जब मन गीले लोहे जैसा हो जाता है, तो उसे आग की भट्टी में नहीं, बल्कि सत्य की धूप में सुखाकर नया रूप देना पड़ता है। हमें सिखाते हैं कि रोज़ थोड़ा-थोड़ा अभ्यास से ही ये स्थिर होता है, जैसे नदी का पानी धीरे-धीरे समुद्र में मिल जाता है।

गुरु का साथ मिले तो मन खुद-ब-खुद राह पर आ जाता है। वो हमें बताते हैं, "बेटा, मन को लगाम लगानी है तो नाम का जाप करो, ध्यान में बैठो।" देखा है न, जो लोग सुबह उठकर ध्यान करते हैं, उनका मन शाम तक शांत रहता है। ये प्रेम की डोर से बंधता है, जब हम हर पल उस परमात्मा को याद रखते हैं। करुणा से भरा ये मन तभी सच्चा सुख पाता है। आखिरकार, यही तो जीवन का सार है—चंचल मन को अमरपुर पहुँचाने का सफर। दिल से अपनाओ, तो सब आसान हो जाता है।
 
“मन तोहे किहि बिध मैं समझाऊँ”  
Meaning / अर्थ : कबीर साहेब का गहन चिंतन और स्वंय के ही मन से संवाद है की मन तुमको कैसे समझाऊ। मन संसार की और भागता है लेकिन साहेब उसे भक्ति मार्ग पर ले जाना चाहते हैं। मन अस्थिर है, चंचल है भक्ति मार्ग के लिए बाधक है। 

“सोना होय तो सुहाग मंगाऊँ...”

मन के विषय में कबीर साहेब का कथन है की यदि तुम स्वर्ण/सोना होते तो सुहाग मंगवाता और सुहाग से सोने को गलाकर तुमको नया रूप दे दूँ। 

“घोड़ा होय तो लगाम लगाऊँ...”
मन, यदि तुम घोड़े होते तो मैं तुम्हे लगाम लगाता। आशय है की मन घोड़े से भी अधिक तीव्र और चंचल है। 

“हाथी होय जंजीर गढ़ाऊँ...”

तुम तो हाथी से अधिक विशाल और शक्तिशाली हो, यदि तुम हाथी होते तो मैं तुमको जंजीर से बाढ़ कर वश में कर लेता। 

 “लोहा होय तो एरण मंगाऊँ...”

यदि तुम /मन यदि तुम लोहा होते तो एरण /लोहा पीटने का आधार, यदि तुम लोहा होते तो मैं एरण लाता और उस पर रख कर तुमको नया आकार देता। 

“ग्यानी होकर ग्यान सिखाऊँ...
ज्ञान और ग्यानी बनकर ही इस मन को वश में किया जा सकता और मोक्ष/अमरपुर की प्राप्ति संभव हो सकती है।  


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