दो रोटी की खातिर बंदे तू अपना राम भुलावे भजन
दो रोटी की खातिर बंदे तू अपना राम भुलावे भजन
दो रोटी की खातिर बंदे तू अपना राम भुलावे भजन
अरे पापी पेट का खेल निराला,
सबको नाच नचावे,
दो रोटी की खातिर बंदे,
तू अपना राम भुलावे।
झूठ कपट की गठरी सिर पर,
तूने खूब उठाई,
सांच को छोड़ा पकड़ा कुड़ा,
खोटी करी कमाई,
जिस काया को नित चमकावे,
वो तो साथ ना जावे,
दो रोटी की खातिर बंदे,
तू अपना राम भुलावे।
अरे अजगर करे ना चाकरी,
पंछी करे ना काम,
दास कबीरा यूं कहे,
सबके दाता राम,
लाख टके का मोल था तेरा,
कौड़ी में बिक गया,
कांच के टुकड़े देख के पगले,
पारस को फेंक दिया,
आंख होते भी अंधा बनके,
क्यों ठोकर तू खावे,
दो रोटी की खातिर बंदे,
तू अपना राम भुलावे।
कुनबा कबीला सब मतलब का,
जब तक पास है दाम,
पाप की जब गठरी खुलेगी,
कोई ना आवे काम,
जिनके खातिर पाप बटोरा,
वो ना भार बटावे,
दो रोटी की खातिर बंदे,
तू अपना राम भुलावे।
धोखे की रेखा बड़ी,
भीतर कबाड़ का ढेर,
यम का डंडा जब पड़े,
तब हो जावेगी देर,
जिस पेट खातिर पाप बटोरा,
वो भी खाक हो जाना,
चिड़िया चुग गई खेत जब,
फिर क्या पछताना,
आज भरेगा कल फिर खाली,
यह तो रीत पुरानी,
इसी अगन में जल गया देखो,
राजा और अभिमानी,
समझ समझ के मूरख बंदे,
क्यों तू गोता खावे,
दो रोटी की खातिर बंदे,
तू अपना राम भुलावे।
पशु भी अपना पेट है भरता,
तुझ में क्या है खास,
ज्ञान की पूंजी पास में तेरे,
फिर भी है तू उदास,
मनुष्य तन ये दुर्लभ पाया,
क्यों माटी में मिलावे,
दो रोटी की खातिर बंदे,
तू अपना राम भुलावे।
कहते कबीर सुनो भई साधो,
मन में रखो धीर,
रूखी सूखी खाय के,
ठंडा राखो नीर,
ईमान बचाओ हरि गुण गाओ,
यही मुक्ति की राह,
पेट की खातिर मत करो,
जीवन में ये गुनाह,
माटी की ये देह,
माटी में है मिल जानी,
पेट की आग बुझाने को,
क्यों ही राह भटकाय,
दो रोटी की खातिर बंदे,
तू अपना राम भुलावे।
अरे पापी पेट का खेल निराला,
सबको नाच नचावे,
दो रोटी की खातिर बंदे,
तू अपना राम भुलावे।
अरे पापी पेट का खेल निराला,
सबको नाच नचावे,
दो रोटी की खातिर बंदे,
तू अपना राम भुलावे।
झूठ कपट की गठरी सिर पर,
तूने खूब उठाई,
सांच को छोड़ा पकड़ा कुड़ा,
खोटी करी कमाई,
जिस काया को नित चमकावे,
वो तो साथ ना जावे,
दो रोटी की खातिर बंदे,
तू अपना राम भुलावे।
अरे अजगर करे ना चाकरी,
पंछी करे ना काम,
दास कबीरा यूं कहे,
सबके दाता राम,
लाख टके का मोल था तेरा,
कौड़ी में बिक गया,
कांच के टुकड़े देख के पगले,
पारस को फेंक दिया,
आंख होते भी अंधा बनके,
क्यों ठोकर तू खावे,
दो रोटी की खातिर बंदे,
तू अपना राम भुलावे।
कुनबा कबीला सब मतलब का,
जब तक पास है दाम,
पाप की जब गठरी खुलेगी,
कोई ना आवे काम,
जिनके खातिर पाप बटोरा,
वो ना भार बटावे,
दो रोटी की खातिर बंदे,
तू अपना राम भुलावे।
धोखे की रेखा बड़ी,
भीतर कबाड़ का ढेर,
यम का डंडा जब पड़े,
तब हो जावेगी देर,
जिस पेट खातिर पाप बटोरा,
वो भी खाक हो जाना,
चिड़िया चुग गई खेत जब,
फिर क्या पछताना,
आज भरेगा कल फिर खाली,
यह तो रीत पुरानी,
इसी अगन में जल गया देखो,
राजा और अभिमानी,
समझ समझ के मूरख बंदे,
क्यों तू गोता खावे,
दो रोटी की खातिर बंदे,
तू अपना राम भुलावे।
पशु भी अपना पेट है भरता,
तुझ में क्या है खास,
ज्ञान की पूंजी पास में तेरे,
फिर भी है तू उदास,
मनुष्य तन ये दुर्लभ पाया,
क्यों माटी में मिलावे,
दो रोटी की खातिर बंदे,
तू अपना राम भुलावे।
कहते कबीर सुनो भई साधो,
मन में रखो धीर,
रूखी सूखी खाय के,
ठंडा राखो नीर,
ईमान बचाओ हरि गुण गाओ,
यही मुक्ति की राह,
पेट की खातिर मत करो,
जीवन में ये गुनाह,
माटी की ये देह,
माटी में है मिल जानी,
पेट की आग बुझाने को,
क्यों ही राह भटकाय,
दो रोटी की खातिर बंदे,
तू अपना राम भुलावे।
अरे पापी पेट का खेल निराला,
सबको नाच नचावे,
दो रोटी की खातिर बंदे,
तू अपना राम भुलावे।
दो रोटी की खातिर बंदे | Nirgun Bhajan | Kabir Vani Inspired Spiritual Song
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Vocals & Composition: AI (Commercial License)
Category: Bhajan / Nirgun / Kabir Vani
दो रोटी जुटाने के चक्कर में झूठ, छल और गलत रास्ते पकड़ लेते हैं, मानो यही सब कुछ हो। लेकिन सोचो वो काया जो चमकाने में हम लगे रहते हैं, वो तो माटी में ही मिल जाएगी। पशु-पक्षी भी अपना भोजन ढूंढ लेते हैं बिना पाप किए। फिर इंसान ज्ञानी होकर भी अज्ञान वाले कार्य करता है। कबीर हमें सिखाते हैं कि सादा जीवन जियो, रूखी-सूखी खाकर नाम जपो, तभी मन को शांति मिलेगी। कबीर की ये बातें दिल को छू जाती हैं, जैसे कोई आंखें खोल रहा हो।
जब कुनबा कबीला साथ होता है तब तो सब ठीक लगता है, लेकिन मुश्किल घड़ी में कोई काम नहीं आता है। पाप की गठरी खुल जाए तो पछतावा ही हाथ लगता है और तब तक देर हो चुकी होती है। राजा महाराजा भी इसी आग में जल गए। राम का नाम ही असली दौलत है। आज से ही फैसला लो, ईमान रखो, हरि के गुण गाओ, यही तो मुक्ति की सीधी राह है। ये बातें सुनकर मन भर आता है, लगता है जैसे कोई अपना ही राह दिखा रहा हो। सच्चाई की राह अपनाओ और अपनी मूलभूत सुख सुविधा को अपनाने के साथ ही हरि के नाम में भी मान लगाओ। जय श्री श्याम।
