सालासर मंदिर महात्म्य रोचक तथ्य और इतिहास
सालासर महाराज मंदिर कहाँ स्थापित है ?
श्री सालासर मंदिर राजस्थान के चूरू जिले के एक कस्बे "सालासर" में स्थापित है। जयपुर बीकानेर मार्ग से आप लक्ष्मणगढ़ से सीधे सालासर पंहुच सकते हैं। मंदिर में श्री हनुमान जी की कृपा है की साल भर भक्तों का ताँता लगा रहता है। भक्त पैदल और गाड़ियों के जरिये पवित्र धाम पर पंहुचते हैं, बाबा के समक्ष अपनी मनोकामना को रखते हैं। यहाँ भक्तो की मनोकामनाएं पूर्ण होती है और भक्त मंदिर में श्री रामजी के परम भक्त सालासर बाबा को प्रसाद, चूरमा चढाते हैं और भंडारे लगाते हैं .सालासर बालाजी मंदिर दर्शन
सालासर बालाजी मंदिर में दर्शन के भक्त जब मुख्य द्वार से प्रवेश करते हैं तो पास ही प्रसाद, भोग लेने की दुकाने हैं. जब मंदिर में प्रवेश करते हैं तो पास में संत मोहनदास जी धूणा है। आप बाहर दुकानों से भोग के लिए लड्डू, पेडे, चूरमा लेकर बाबा को भोग अर्पित कर प्रसाद लें। इसके उपरान्त आप मोहनदास जी, धुना और अंजनी माता के मंदिर में भी जाए।दाढ़ी मूछ वाले हैं सालासर बालाजी
सालासर बालाजी मंदिर ही एकमात्र ऐसा मंदिर है जहाँ पर श्री हनुमानजी को दाढ़ी मूछ की प्रतिमा है। अन्य स्थानों पर हनुमान जी को बगैर दाढ़ी मूछ के साथ दिखाया जाता है। संत मोहनदास जी को स्वप्न में दाढ़ी-मूंछ वाले साधु ने दर्शन दिए थे । उसी रूप में असोटा से प्राप्त स्वयंभू मूर्ति स्थापित की गई।सालासर बालाजी मंदिर दर्शन समय
सालासर बालाजी मंदिर के दर्शन का समय मौसम अनुसार बदलता है। मंगलवार व शनिवार को विशेष भीड़ रहती है। आइये बालाजी महाराज के मंदिर के विषय में समय को जान लेते हैं, जब आप दर्शन के लिए आये तो जरूर ध्यान रखें।मंदिर खुलने-बंद होने का समय
- गर्मियों में (अप्रैल - सितंबर)
- खुलने का समय: 4:00 AM
- बंद होने का समय: 10:00 PM
सर्दियों में (अक्टूबर - मार्च)
- खुलने का समय: 5:00 AM
- बंद होने का समय: 9:00 PM
- सर्दियों में आरतियाँ:
- मंगल आरती: 5:30 AM
- मोहनदास जी आरती: 6:00 AM
- राजभोग आरती: 10:15 AM
- धूप गोवळ आरती: 5:00 PM
- मोहनदास जी आरती: 5:30 PM
- संध्या आरती: 6:00 PM
- बालभोग स्तुति: 7:00 PM
- शयन आरती: 9:00 PM
- राजभोग महाप्रसाद (मंगलवार): 11:00 AM
- मंगल आरती: 5:00 AM
- मोहनदास जी आरती: 5:30 AM
- राजभोग आरती: 10:00 AM
- धूप गोवळ आरती: 6:30 PM
- मोहनदास जी आरती: 7:00 PM
- संध्या आरती: 7:30 PM
- बालभोग स्तुति: 8:00 PM
- शयन आरती: 10:00 PM
- राजभोग महाप्रसाद (मंगलवार): 10:00 AM
सालासर बालाजी मंदिर दर्शन के लिए क्या करें क्या नहीं
सालासर बालाजी धाम में दर्शन के समय शुद्धता और श्रद्धा का विशेष महत्व है, यदि आप दर्शन करने आ रहे हैं तो कृपया कुछ बातों का ध्यान रखें।
क्या करें:
- शुद्धता रखें: स्नान कर शुद्ध वस्त्र धारण करें। यह आस्था का प्रतीक है।
- उचित वेशभूषा: पुरुष धोती/पायजामा के साथ शर्ट पहनें। महिलाएँ साड़ी, सूट या दुपट्टे वाली सलवार पहनें।
- सादगी अपनाएँ: सादे वस्त्र पहनें। शॉर्ट्स, टी-शर्ट, मिनी स्कर्ट आदि से बचें।
- श्रद्धा से दर्शन: शांत भाव से दर्शन करें। मनोकामना पूरी होने पर सवामणी चढ़ाएँ।
क्या न करें:
- धूम्रपान निषिद्ध: सिगरेट, बीड़ी, हुक्का पूरी तरह वर्जित।
- नशीले पदार्थ न लें: शराब, गुटखा, तंबाकू, पान का सेवन न करें।
- थूकना वर्जित: मंदिर परिसर में कहीं भी थूकना निषिद्ध।
- अश्लीलता न करें: अनुचित व्यवहार या वस्त्रधारा से बचें।
श्री सालासर धाम का कण कण ही पवित्र है, भक्त विशेष रूप से बाबा के दर्शन करते हैं और इसके उपरान्त कई अन्य पावन स्थलों पर भी जाते हैं, आइये जान लेते हैं की अन्य स्थल कौनसे हैं।
मोहनदास जी का धूणा/मोहनदासजी की समाधि
मंदिर के मुख्य दरवाजे से थोड़ी दूर ही परम संत मोहनदास जी की समाधी है, जहाँ पर मोहनदास जी कानीबाई की मृत्यु के उपरान्त जीवित समाधि ली थी। यहीं पर मोहनदास जी का धुंणा भी है।
मोहनदास जी का धूणा सालासर बालाजी धाम का सबसे पवित्र तीर्थ स्थल है, जहाँ संत शिरोमणी, सिद्धपुरूष, भक्त प्रवर श्री मोहनदास जी महाराज ने स्वयं अपने पवित्र करकमलों से अखंड अग्नि प्रज्ज्वलित की थी। यह धूणा विक्रम संवत 1811 से निरंतर 270 वर्षों से प्रज्वलित है। मंदिर के दक्षिण द्वार के ठीक सामने स्थित यह स्थान भक्तों के लिए संकट निवारण का प्रतीक है। भक्त पूरे श्रद्धाभाव से विभूति (भभूत) लेते हैं और मस्तक पर लगाते हैं। मान्यता है कि इस पवित्र राख से सर्पदंश, रोग, संकट दूर होते हैं।
अंजनी माता मंदिर: सालासर धाम का पवित्र स्थल
सालासर बालाजी धाम से लक्ष्मणगढ़ की ओर 2 किलोमीटर दूर अंजनी माता का प्राचीन मंदिर स्थित है। भक्त मानते हैं कि सालासर बालाजी दर्शन के साथ ही अंजनी माता के मंदिर में जाना शुभ होता है। यहाँ नवविवाहित जोड़ों की जात भी लगती है। आप भी माता का आशीर्वाद प्राप्त करें, बालाजी महाराज तक आपकी उपस्थिति जल्दी पंहुचती है।
भक्त मंदिर में अपना मस्तक मातारानी के मंदिर में झुकाते हैं और गर्भगृह की परिक्रमा करते हैं। भक्त मातारानी की जय बोलते हैं और बालाजी महाराज का सुमिरन करते हैं. अंजनी माता के मंदिर में धोक लगाने से संतान प्राप्ति और परिवार कल्याण की मनोकामना पूर्ण होती है। मंदिर में अंजनी माता की प्रतिमा में बालाजी महाराज बाल रूप में उनकी गोद में हैं। अंजनी माता के मंदिर का निर्माण श्री पन्नारामजी पारीक जी द्वारा करवाया गया है। सुहागन स्त्रियां गठजोड़े की जात देने के लिए नारियल और सिन्दूर को मंदिर में चढाती हैं। जय श्री सालासर बालाजी महाराज की!
सालासर बालाजी मंदिर का माहात्म्य कथा, इतिहास
राजस्थान के चूरू जिले का सलासर धाम हनुमान जी का स्वयंभू पीठ है, जहाँ दाढ़ी-मूंछ युक्त बालाजी महाराज विराजमान हैं। यह कथा भक्ति, चमत्कार और ईश्वरीय लीला का जीवंत प्रमाण है। आइए जान लेते हैं मंदिर निर्माण की पूर्ण कथा विस्तार से।सालासर गांव में रहने वाले संत मोहनदास जी हनुमान जी के परम भक्त थे। उनकी तपस्या और भक्ति देखकर स्वयं रामदूत हनुमान जी प्रसन्न हुए। संत जी दिन-रात भगवान का स्मरण करते, उनकी आरती उतारते। उनकी पुकार सुनकर भगवान ने स्वयं मूर्ति रूप धारण करने का निर्णय लिया।
असोटा गांव में चमत्कारिक प्रकटी
विक्रम संवत 1811 (1754 ई.) श्रावण शुक्ल नवमी, शनिवार को नागौर जिले के असोटा गांव में एक किसान अपने खेत की जुताई कर रहा था। अचानक उसके हल की नोक से कोई कठोर वस्तु टकराई। गूंजती आवाज सुनकर किसान ने उत्सुकता से मिट्टी खोदी। वहाँ मिट्टी में सनी स्वर्णिम बालाजी की मूर्ति प्रकट हुई।
किसान ने तुरंत अपनी पत्नी को बुलाया। पत्नी भोजन लेकर पहुँची। किसान ने मूर्ति दिखाई। पत्नी ने अपनी साड़ी से मूर्ति को प्रेमपूर्वक साफ किया। भक्त भाव से दोनों ने बाजरे के चूरमे का पहला भोग लगाया। यही कारण है कि आज भी सलासर धाम में बालाजी को बाजरे का चूरमा चढ़ाया जाता है।
स्वप्नों में ईश्वरीय संदेश
उसी रात असोटा के ठाकुर को स्वप्न आया। बालाजी ने आदेश दिया, "इस मूर्ति को चूरू जिले के सालासर ले जाओ।" ठाकुर ने प्रातःकाल गाँववालों को बताया। उधर सालासर के मोहनदास जी को भी ठीक उसी रात स्वप्न आया। बालाजी ने कहा, "असोटा से मेरी मूर्ति आ रही है, तुम मेरी अगवानी के लिए तैयार हो जाओ।"
मोहनदास जी ने तुरंत असोटा के ठाकुर को संदेश भेजा। ठाकुर आश्चर्यचकित रह गया - मोहनदास जी तो सलासर में हैं, फिर उन्हें कैसे पता? यह चमत्कार बालाजी की सर्वशक्तिमान लीला का प्रमाण था।
मूर्ति यात्रा और स्थापना
मोहनदास जी स्वयं मूर्ति लाने असोटा पहुँचे। सम्मानपूर्वक मूर्ति को रथ पर रखा। मोहनदास जी ने घोषणा की, "जहाँ बैल रुकेंगे, वही स्थापना स्थल होगा।" बैलगाड़ी सालासर पहुँची। रेत के टीले पर बैल रुक गए। उसी पावन स्थान पर श्रावण शुक्ल नवमी को मूर्ति स्थापित हुई।
मंदिर निर्माण का सौहार्द्यपूर्ण उदाहरण
विक्रम संवत 1815 (1759 ई.) में मोहनदास जी ने नूर मोहम्मद और दाऊ नामक मुस्लिम कारीगरों से मंदिर बनवाया। यह हिंदू-मुस्लिम सौहार्द का अनुपम प्रतीक है। मंदिर में आज भी उनकी स्मृति बरकरार है।
विशेष स्वरूप और परंपराएँ
स्वप्न में बालाजी ने दाढ़ी-मूंछ युक्त स्वरूप दिखाया था। इसलिए मूर्ति को उसी रूप में स्थापित किया गया। मोहनदास जी ने शिष्य उदयराम जी को चोगा पहनाकर मंदिर सेवा सौंपी। अखंड ज्योति तब से निरंतर प्रज्ज्वलित है।
मोहनदास जी की जीवित समाधि
विक्रम संवत 1850 (1794 ई.) वैशाख शुक्ल त्रयोदशी को प्रातःकाल संत मोहनदास जी ने जीवित समाधि लेकर ब्रह्मलीन हो गए। उनकी गद्दी आज भी मंदिर में विराजमान है।
मनोति बांधने की परंपरा
मोहनदास जी के वचनानुसार भक्त "मनोति का नारियल" बांधते हैं। मनोकामना पूरी होने पर 5 मन लाडू चढ़ाते हैं। ये नारियल पवित्र माने जाते हैं।
श्री सालासर बालाजी महाराज का भोग
श्री बालाजी महाराज भाव के भूखे हैं, लेकिन भक्त अपनी मनोकामना पूर्ण करने के लिए भोग भी चढाते हैं. आइये बाबा के भोग के बारे में जान लेते हैं।- बूंदी के लाड्डू: बालाजी को बचपन से ही बूंदी लाड्डू सबसे प्रिय हैं। सवामणी में अधिकांश भक्त यही भोग चढ़ाते हैं।
- बाजरे का चूरमा: असोटा के किसान ने प्रकटी मूर्ति को पहला भोग यही लगाया था। तब से यह परंपरा चली आ रही है।
- केसर पेड़े: मीठे रसवाले पेड़े बालाजी को विशेष रूप से भाते हैं। भक्त इन्हें प्रेम से अर्पित करते हैं।
- बेसन की बर्फी: बेसन लाड्डू व बर्फी भी प्रिय। सवामणी में बेसन व्यंजनों का विशेष महत्व है।
- दाल-बाटी-चूरमा: सवामणी का प्रमुख भोजन। 50 किलो तक का प्रसाद तैयार कर बालाजी को अर्पित करते हैं।
- लाडू सवामणी: मनोकामना पूरी होने पर 5 मन लाडू (लगभग 200 किलो) चढ़ाते हैं।
दिल्ली से सलासर धाम हनुमान मंदिर कैसे आयें
नजदीकी रेलवे स्टेशन- सुजानगढ़: 38 मिनट (27 किमी) - सबसे नजदीक
- रतनगढ़: 1 घंटा 17 मिनट (44 किमी)
- लक्ष्मणगढ़: 42 मिनट (35 किमी)
- सीकर: 1 घंटा 6 मिनट (60 किमी)
- जयपुर: 3 घंटे 1 मिनट (168 किमी)
- सालासर: 7 मिनट (700 मीटर) - मंदिर के पास ही
- सुजानगढ़: 36 मिनट (25 किमी)
- जयपुर: 3 घंटे 8 मिनट (185 किमी)
- नजदीकी हवाई अड्डा
- जयपुर: 3 घंटे 20 मिनट (184 किमी)
- किशनगढ़: 3 घंटे 29 मिनट (163 किमी)
- बीकानेर: 3 घंटे 38 मिनट (190 किमी)
- जोधपुर: 4 घंटे 46 मिनट (266 किमी)
सालासर बालाजी मंदिर के रोचक तथ्य
- विश्व का एकमात्र दाढ़ी-मूंछ हनुमान: अन्य सभी मंदिरों में युवा अवतार, यहाँ साधु रूप में विराजमान।
- स्वयंभू मूर्ति: विक्रम संवत 1811 में असोटा खेत से प्रकट। स्वप्न आदेश से सालासर लाई गई।
- अखंड धूणा: मोहनदास जी ने 270 वर्ष पूर्व प्रज्ज्वलित, आज भी जल रही। विभूति संकट निवारक।
- मुस्लिम कारीगरों का निर्माण: नूर मोहम्मद व दाऊ ने बनाया। हिंदू-मुस्लिम सौहार्द का प्रतीक।
- बाजरे का चूरमा भोग: पहला भोग किसान पत्नी ने लगाया। परंपरा आज भी चली आ रही।
- नारियल बांधने की मनौती: मनोकामना पूरी होने पर सवामणी चढ़ाते हैं।
- 5 मन लाड्डू सवामणी: सबसे लोकप्रिय मनौती। भक्त 200 किलो लाड्डू चढ़ाते हैं।
- 4 प्रमुख मेले: चैत्र, आश्विन, फाल्गुन, भादो पूर्णिमा पर लाखों भक्त। निःशुल्क भंडारे।
- चांदी का गर्भगृह: स्वर्णिम प्रतिमा रजत गर्भ गृह में शोभित है.
- मंगलवार विशेष राजभोग: महाप्रसाद आरती का महत्व।
- श्री सालासर बालाजी हनुमान जी की सिद्धपीठ है।
- श्री सालासर जी महाराज का मूल मंदिर "चढ़ावे के पांच" रुपये से बना था।
- श्री सालासर मंदिर का निर्माण फतेहपुर के कारीगर नूर मोहम्मद और दाऊ के द्वारा किया गया है जो हिन्दू मुस्लिम प्रेम का आदर्श उदाहरण है।
- मोहनदासजी के दो कोठले थे जिनमे अनाज था जो कभी भी समाप्त नहीं होता था। मोहनदास ने इन छोटे कमरों को बंद रखने का आदेश दिया था, जब इनको खोला गया तो यह सिद्धि समाप्त हो गई।
श्री सालासर बालाजी यंत्र
बालाजी महाराज को प्रसन्न करने के लिए प्रातः काल शुद्ध होकर लाल वस्त्र धारण करके आसान पर बैठ कर हनुमान जी की मूर्ति को लड्डू का भोग लगाए और बाबा का मन्त्र पढ़ें -
अतुलित बलधामं हेम शैलाभदेहं,
दनुज-वन कृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्।
सकल गुणानिधानं वानराणामधीशं,
रघुपति प्रियभक्तं वातजातं नमामि॥
श्री सालासर बालाजी की आरती
जयति जय जय बजरंग बाला, कृपा कर सालासर वाला।
चैत सुदी पूनम को जन्मे, अंजनी पवन खुशी मन में।
प्रकट भए सुर वानर तन में, विदित यश विक्रम त्रिभुवन में।
दूध पीवत स्तन मात के, नजर गई नभ ओर।
तब जननी की गोद से पहुंच, उदयाचल पर भोर।
अरुण फल लखि रवि मुख डाला।
कृपा कर सालासर वाला।
तिमिर भूमंडल में छाई, चिबुक पर इंद्र वज्र बाए।
तभी से हनुमत कहलाए, द्वय हनुमान नाम पाए।
उस अवसर में रुक गयो, पवन सर्व उन्चास।
इधर हो गयो अंधकार, उत रुक्यो विश्व को श्वास।
भए ब्रह्मादिक बेहाला।
कृपा कर सालासर वाला।
देव सब आए तुम्हारे आगे, सकल मिल विनय करन लागे।
पवन को भी लाए सांगे, क्रोध सब पवन तना भागे।
सभी देवता वर दियो, अरज करी कर जोड़।
सुनके सबकी अरज गरज, लखि दिया रवि को छोड़।
हो गया जग में उजियाला।
कृपा कर सालासर वाला।
रहे सुग्रीव पास जाई, आ गए वन में रघुराई।
हरी रावण सीतामाई, विकल फिरते दोनों भाई।
विप्र रूप धरि राम को, कहा आप सब हाल।
कपि पति से करवाई मित्रता, मार दिया कपि बाल।
दुख सुग्रीव तना टाला।
कृपा कर सालासर वाला।
आज्ञा ले रघुपति की धाया, लंक में सिंधु लांघ आया।
हाल सीता का लख पाया, मुद्रिका दे वनफल खाया।
वन विध्वंस दशकंध सुत, वध कर लंक जलाय।
चूड़ामणि संदेश सिया का, दिया राम को आय।
हुए खुश त्रिभुवन भूपाला।
कृपा कर सालासर वाला।
जोड़ी कपि दल रघुवर चाला, कटक हित सिंधु बांध डाला।
युद्ध रच दीन्हा विकराला, कियो राक्षसकुल पैमाला।
लक्ष्मण को शक्ति लगी, लायो गिरी उठाय।
देइ संजीवन लखन जियाए, रघुबर हर्ष सवाय।
गरब सब रावन का गाला।
कृपा कर सालासर वाला।
रची अहिरावन ने माया, सोवते राम लखन लाया।
बने वहां देवी की काया, करने को अपना चित चाया।
अहिरावन रावन हत्यो, फेर हाथ को हाथ।
मंत्र विभीषण पाय आप को, हो गयो लंका नाथ।
खुल गया करमा का ताला।
कृपा कर सालासर वाला।
अयोध्या राम राज्य कीना, आपको दास बना दीना।
अतुल बल घृत सिंदूर दीना, लसत तन रूप रंग भीना।
चिरंजीव प्रभु ने कियो, जग में दियो पुजाय।
जो कोई निश्चय कर के ध्यावे, ताकी करो सहाय।
कष्ट सब भक्तन का टाला।
कृपा कर सालासर वाला।
भक्तजन चरण कमल सेवे, जात आत सालासर देवे।
ध्वजा नारियल भोग देवे, मनोरथ सिद्धि कर लेवे।
कारज सारों भक्त के, सदा करो कल्याण।
विप्र निवासी लक्ष्मणगढ़ के, बालकृष्ण धर ध्यान।
नाम की जपे सदा माला।
कृपा कर सालासर वाला।
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