शाकंभरी माता मंदिर कुचामन सिटी इतिहास रोचक तत्थ्य

शाकंभरी माता मंदिर कुचामन सिटी

शाकंभरी माता मंदिर, कुचामन सिटी के आस्था का प्रमुख केंद्र है। शाकंभरी पहाड़ी अरावली पर्वतमाला का भाग है, जहां पर मातारानी का मंदिर मंदिर शक्ति पीठ के रूप में जाना जाता है। आस पास भक्तों के भक्तों के अतिरिक्त मातारानी के भक्त पूरे राजस्थान में हैं। शाकम्भरी मातारानी आद शक्ति/आदि शक्ति का रूप हैं, जो सूधे और अकाल के समय जगत में आई और भूखे लोगों को भोजन दिया। संस्कृत में 'शक' का अर्थ सब्जियां और 'अंबरी' का अर्थ भूखे की देखभाल करने वाली है, यही कारण है कि उनका नाम शाकंभरी पड़ा। वेदों की कथाओं के अनुसार, ब्रह्माजी ने तपस्या से प्रसन्न होकर राक्षस दुर्गम को वरदान दिया, जिससे वह देवताओं और ऋषियों से शक्तिशाली हो गया। अहंकारी राक्षस ने भोजन की कमी पैदा कर देवताओं और ऋषियों के लिए सदा ही दुःख पैदा किये । तब मां शाकंभरी ने भक्तजनों की सुध ली और उन्हें भोजन दिया । 
 
Shakambhari Mata Temple Kuchaman History Facts

राजा प्रताप सिंह 18वीं शताब्दी (लगभग 1700-1750 ईस्वी) के आसपास के शासक थे, जब राठौड़ राजवंश जोधपुर साम्राज्य के अधीन कुचामन पर शासन कर रहा था। शाकम्भरी मातारानी का मंदिर राजा प्रताप सिंह के समय में बनवाया गया था। राजा प्रताप सिंह मां शाकंभरी के परम भक्त थे, जो नित्य मातारानी की पूजा अर्चना और आरती किया करते थी।  मातारानी के दरबार में वैसे तो हर समय ही भक्त आते हैं लेकिन विशेष रूप से अश्विन और चैत्र में मातारानी का मेला भरता है। मातारानी अपने भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण करती है।  स्थानीय भक्त जन प्रातः कालीन और संध्या की आरती में शामिल होते हैं। 
 
Shakambhari Mata Mandir Kuchamancity Pravesh Dwar

शाकंभरी माता का मंदिर कुचामन सिटी से लगभग ५ किलोमीटर की दूर पर है। इसके पास भेरू तालाब है। मंदिर छोटी पहाड़ी पर स्थापित है। मुख्य राजमार्ग पर ही मातारानी का द्वार बना है, जिससे आप सीधे चलकर मातारानी के मंदिर पंहुच सकते हैं।  इसके आस पास नमक के खेत हैं जहाँ भूमिगत जल, जो की नमकयुक्त है, निकाल कर धुप में सुखाया जाता है जिससे नमक बनता है। मातारानी के मंदिर से कुचामन शहर का विहंगम दृश्य दिखाई देता है। 
Namak ke Khet Near Shakambhari Mata Mandir Kuchaman City

शाकम्भरी माता रानी की कथा

प्राचीन काल में दुर्गम नामक शक्तिशाली असुर ने ब्रह्मा जी की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर चारों वेद प्राप्त किए और उन्हें छिपा दिया। इससे पृथ्वी पर धर्म का नाश हो गया, जगत में बरसात का आना बन्द हो गया। लगभग 100 वर्ष तक भयंकर सूखा पड़ गया। नदियां सूखीं, वनस्पतियां नष्ट हो गईं, अन्न-जल का अभाव होने से ऋषि-मुनि, देवता और प्राणी भूख-प्यास से तड़पने लगे। असुरों ने इस संकट का लाभ उठाकर भक्तजनों का जीवन दूभर कर दिया। 

शाकंभरी माता मंदिर कुचामन सिटी

देवताओं और ऋषियों की प्रार्थना से प्रसन्न होकर आदि शक्ति दुर्गा ने शाकंभरी रूप धारण किया और जगत को इस विपत्ति से उबारने के लिए अवतार लिया। उनके शरीर पर सौ नेत्र (शताक्षी) थे, जो करुणा से भरे थे। उन्होंने नौ दिनों तक रोया, जिससे आंसू धाराएं बनीं और बाणगंगा नदी का उद्गम हुआ। इससे पृथ्वी पर जल बहने लगा, फल-फूल, सब्जियां, जड़ी-बूटियां उत्पन्न हुईं। 'शाक' अर्थात् सब्जी और 'भरी' अर्थात् धारण करने वाली—इसलिए नाम शाकंभरी पड़ा। उन्होंने भक्तों को भोजन प्रदान किया और अपनी तीन अन्य शक्तियों—भीमा, भ्रामरी तथा रक्तदंतिका को प्रकट किया।

​शाकंभरी माता ने दुर्गमासुर से घोर युद्ध किया। उन्होंने पृथ्वी और स्वर्ग के बीच घेरा रचा, जिसमें असुर फंस गए। भ्रामरी रूप में भौंरों से असुरों का संहार किया। अंततः दुर्गम का वध कर वेद लौटाए और जीवन बहाल किया। एक अन्य कथा में माता ने 100 वर्ष तप किया, जहां निर्जन भूमि हरी-भरी हो गई।

शाकंभरी माता रानी आरती

हरि ॐ श्री शाकुम्भरी अम्बाजी की आरती कीजो
ऐसी अद्भुत रूप हृदय धर लीजो

शताक्षी दयालु की आरती कीजो
तुम परिपूर्ण आदि भवानी मां, सब घट तुम आप बखानी मां
शाकुम्भरी अम्बाजी की आरती कीजो

तुम्हीं हो शाकुम्भर, तुम ही हो सताक्षी मां
शिवमूर्ति माया प्रकाशी मां,
शाकुम्भरी अम्बाजी की आरती कीजो

नित जो नर-नारी अम्बे आरती गावे मां
इच्छा पूर्ण कीजो, शाकुम्भर दर्शन पावे मां
शाकुम्भरी अम्बाजी की आरती कीजो
जो नर आरती पढ़े पढ़ावे मां, 
जो नर आरती सुनावे मां
 बस बैकुंठ शाकुम्भर दर्शन पावे
शाकुम्भरी अंबाजी की आरती कीजो। 
 

श्री शाकंभरी चालीसा


॥ दोहा ॥
श्री गणपति गुरुपद कमल, सकल चराचर शक्ति
ध्यान करिअ नित हिय कमल । प्रणमिअ विनय सभक्ति ।
आद्या शक्ति पधान, शाकंभरी चरण युगल ।
प्रणमिअ पुनि करि ध्यान, नील कमल रुचि अति बिमल ॥

॥ चौपाई ॥
जय जय श्री शाकंभरी जगदम्बे,
सकल चराचर जग अविलम्बए ॥
जयति सृष्टि पालन संहारिणी,
भव सागर दारुण दुःख हारिणी ॥

नमो नमो शाकंभरी माता,
सुख सम्पत्ति भव विभव विधाता ॥
तव पद कमल नमहिं सब देवा,
सकल सुरासुर नर गन्धर्वा ॥

आद्या विद्या नमो भवानी,
तूँ वाणी लक्ष्मी रुद्राणी ॥
नील कमल रूचि परम सुरूपा,
त्रिगुणा त्रिगुणातीत अरूपा ॥

इन्दीवर सुन्दर वर नयना,
भगत सुलभ अति पावन अयना ॥
त्रिवली ललित उदर तनु देहा,
भावुक हृदय सरोज सुगेहा ॥

शोभत विग्रह नाभि गम्भीरा,
सेवक सुखद सुभव्य शरीरा ॥
अति प्रशस्त धन पीन उरोजा,
मंगल मन्दिर बदन सरोजा ॥

काम कल्पतरु युग कर कमला,
चतुर्वर्ग फलदायक विमला ॥
एक हाथ सोहत हर तुष्टी,
दुष्ट निवारण मार्गन मुष्टी ॥

अपर विराजत सुरुचि चापा,
पालन भगत हरत भव तापा ॥
एक हाथ शोभत बहु शाका,
पुष्प मूल फल पल्लव पाका ॥

नाना रस, संयुक्त सो सोहा,
हरत भगत भय दारुण मोहा ॥
एहि कारण शाकंभरी नामा,
जग विख्यात दत सब कामा ॥

अपर हाथ बिलसत नव पंकज,
हरत सकल संतन दुःख पंकज ॥
सकल वेद वन्दित गुण धामा,
निखिल कष्ट हर सुखद सुनामा ॥

शाकंभरी शताक्षी माता,
दुर्गा गौरी हिमगिरि जाता ॥
उमा सती चण्डी जगदम्बा,
काली तारा जग अविलम्बा ॥

राजा हरिश्चन्द्र दुःख हारिणी,
पुत्र कलत्र राज्यसुखं कारिणी ॥
दुर्गम नाम दैत्य अति दारूण,
हिरण्याक्ष कुलजात अकारूण ॥

उग्र तपस्या वधि वर पावा,
सकल वेद हरी धर्म नशावा ॥
तब हिमगिरि पहुँचे सब देवा,
लागे करन मातु पद सेवा ॥

प्रगट करुणामयि शाकंभरी,
नाना लोचन शोभिनी शंकरि ॥
दुःखित देखि देवगण माता,
दयामयि हरि सब दुःख जाता ॥

शाक मूल फल दी सुरलोका,
क्षुधा तृषा हरली सब शोका ॥
नाम शताक्षी सब जग जाना,
शाकंभरी अपर अभिघाना ॥

सुनि दुर्गम दानव संहारो,
संकट मे सब लोक उबारो ॥
किन्हीं तब सुरगण स्तुति-पूजा,
सुत पालिनी माता नहि दूजा ॥

दुर्गा नाम धरे तब माता,
संकट मोचन जग विख्याता ॥
एहि विधि जब-जब उपजहिं लोका,
दानव दुष्ट करहि सुर शोका ॥

तब-तब धरि अनेक अवतारा,
पाप विनाशनि खल संहारा ॥
पालहि विबुध विप्र अरू वेदा,
हरहिं सकल संतन के खेदा ॥

जय जय शाकंभरी जग माता,
तब शुभ यश त्रिभुवन विख्याता ॥
जो कोई सुजस सुनत अरू गाता,
सब कामना तुरंत सो पाता ॥

नेति नेति तुअ वेद बखाना,
प्रणब रूप योगी जन जाना ॥
नहि तुअ आदि मध्य अरू अन्ता,
मो जानत तुअ चरित्र अनन्ता ॥

हे जगदम्ब दयामयि माता,
तू सेवत नहिं विपति सताता ॥
एहि विधि जो तच्च गुण गण जाता,
सो इह सुखी परमपद पाता ॥

॥ दोहा ॥
जो नित चालीसा पढ़हि, श्रद्धा मे नव बार ।
शाकंभरी चरण युगल, पूजहिं भक्ति अपार ॥

सो इह सुख सम्पत्ति लभहि, ज्ञान शक्ति श्रुति सार ।
बिनु श्रम तरहिं विवेक लहि, यह दुर्गम संसार ॥

कृष्णानन्द अमन्द मुद, सुमति देहु जगदम्ब ।
सकल कष्ट हरि तनमन के, कृपा करहु अविलम्ब ॥ 
 

शाकंभरी माता मंदिर, कुचामन सिटी कैसे पंहुचे

शाकंभरी माता मंदिर, कुचामन सिटी पहुंचना आसान है, क्योंकि यह डीडवाना कुचामन सिटी जिले के कुचामनसिटी से मात्र 3 किमी दक्षिण की शाकंभरी पहाड़ी पर स्थित है। जयपुर से लगभग 130-140 किमी दूर (सड़क मार्ग से 2-3 घंटे), दिल्ली से करीब 380 किमी (6-7 घंटे), जोधपुर से 140 किमी (2.5-3 घंटे) और सीकर से 100 किमी (2 घंटे) की दूरी है। नजदीकी हवाई अड्डा जयपुर इंटरनेशनल (130 किमी), रेलवे स्टेशन कुचामन सिटी (2-3 किमी) और बस स्टैंड भी शहर में ही है। सड़क मार्ग से NH-58 या मेगा हाइवे से कार, टैक्सी या बस लें, फिर शहर से ऑटो रिक्शॉ, जीप आदि से आप मंदिर पंहुच सकते हैं। 

आप रेल के माध्यम से भी मंदिर पंहुच सकते हैं, कुचामन सिटी (KMNC) रेलवे स्टेशन शाकंभरी माता मंदिर का निकटतम स्टेशन है। जयपुर से कई ट्रेनें चलती हैं, जैसे हावड़ा-जोधपुर एक्सप्रेस (12307), वंदे भारत एक्सप्रेस (22478), रणथंभौर एक्सप्रेस (12465), लीलान एक्सप्रेस (12468), जो 1.5-2 घंटे में पहुंचाती हैं। जोधपुर से मंडोर एक्सप्रेस (22995), भीलवाड़ा एक्सप्रेस आदि उपलब्ध हैं। दिल्ली से से रेल यहाँ पंहुचने के लिए 5-6 घंटे लेती है। स्टेशन पहुंचकर ऑटो या टैक्सी से मंदिर आ सकते हैं।  

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